महामहोपाध्याय (म० म०) भवनाथ मिश्र मिथिला के बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास के सबसे चमकदार सितारों में से एक हैं। इतिहास और लोककथाओं में वे अपने मूल नाम की अपेक्षा अपने उपनाम "अयाची मिश्र" के रूप में अधिक विख्यात हैं। वे 'सरिसब' मूलग्राम के गौरव और म० म० शंकर मिश्र के पिता थे।
'अयाची' नाम का अर्थ और उनका स्वभाव
संस्कृत में 'अयाची' (अ + याची) का अर्थ होता है—वह व्यक्ति जो कभी किसी से कुछ नहीं मांगता। प्राचीन काल में विद्वान ब्राह्मणों और गुरुओं को राजाओं और जमींदारों से प्रचुर मात्रा में दान और भूमि (जागीर) मिलती थी। लेकिन भवनाथ मिश्र ने जीवन भर यह व्रत लिया कि वे अपनी विद्या या अपनी किसी भी जरूरत के लिए कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।
उनका जीवन अत्यंत घोर गरीबी में बीता, लेकिन उनका आत्मसम्मान और ज्ञान का तेज इतना महान था कि बड़े-बड़े राजा उनके सामने नतमस्तक होते थे।
शिक्षा का अनूठा 'विद्यादान' मॉडल
अयाची मिश्र का सबसे बड़ा योगदान शिक्षा के क्षेत्र में उनकी निःशुल्क व्यवस्था थी, जो आज भी एक मिसाल है। वे अपने आश्रम (सरिसब-पाही) में देशभर से आने वाले हजारों छात्रों को न्याय शास्त्र पढ़ाते थे।
अनोखी गुरुदक्षिणा: वे अपने छात्रों से धन के रूप में एक भी पैसा गुरुदक्षिणा नहीं लेते थे। जब छात्र शिक्षा पूरी कर घर लौटने लगते, तो अयाची मिश्र की गुरुदक्षिणा सिर्फ इतनी होती थी: "तुम यहाँ से जाकर कम से कम 10 अन्य छात्रों को निःशुल्क विद्यादान करना।"
इस 'नॉलेज मल्टीप्लायर' मॉडल के कारण मिथिला के घर-घर में न्याय शास्त्र के विद्वान पैदा हो गए।
सादा जीवन और लोककथाएं
उनका जीवन इतनी सादगी और त्याग से भरा था कि मिथिला में उनके बारे में कई लोककथाएं प्रचलित हैं:
भगवान शिव की कथा: मान्यता है कि उनकी निस्वार्थ भक्ति और ज्ञान-साधना से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव एक साधारण बालक का रूप धारण करके उनके घर में नौकर (सेवक) के रूप में काम करने आए थे।
कहा जाता है कि जब उनके घर में खाने को कुछ नहीं होता था, तब भी वे और उनकी पत्नी भवानी देवी पूरे संतोष के साथ ईश्वर का ध्यान करते थे।
न्याय शास्त्र में योगदान
यद्यपि अयाची मिश्र के पुत्र म० म० शंकर मिश्र ने दर्शनशास्त्र पर अनेक महान ग्रंथ लिखे, लेकिन भवनाथ मिश्र ने अपना पूरा जीवन ग्रंथ लिखने के बजाय 'छात्र गढ़ने' में लगा दिया।
वे नव्य-न्याय के प्रकांड पंडित थे। मिथिला के जिस न्याय शास्त्र ने आगे चलकर बंगाल के नवद्वीप में जाकर महान रूप लिया, उसकी नींव मजबूत करने वाले शिक्षकों में अयाची मिश्र सबसे ऊपर आते हैं।
शास्त्रार्थ में उनका कोई सानी नहीं था, लेकिन वे अपनी विद्या का प्रयोग कभी किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं करते थे।