अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम्॥"
म० म० शंकर मिश्र ऐतिहासिक भूमि की सबसे महान देन हैं। 15वीं शताब्दी के भारतीय दर्शन (विशेषकर न्याय और वैशेषिक शास्त्र) में उनका स्थान अद्वितीय है।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि (सरिसब मूल)
महान पिता के पुत्र: शंकर मिश्र के पिता मिथिला के महान नैयायिक भवनाथ मिश्र थे, जिन्हें दुनिया 'अयाची मिश्र' के नाम से जानती है। ('अयाची' का अर्थ है वह व्यक्ति जो कभी किसी से कुछ नहीं मांगता)।
अयाची मिश्र बिना किसी शुल्क के हजारों छात्रों को न्याय शास्त्र पढ़ाते थे और उन्होंने अपने पुत्र शंकर मिश्र को भी उसी तपोमय वातावरण में शिक्षित किया। शंकर मिश्र की माता का नाम भवानी था। इनका जन्म और कर्मक्षेत्र सरिसब-पाही (वर्तमान मधुबनी जिला) था।
बाल्यकाल की विलक्षण प्रतिभा (Child Prodigy)
शंकर मिश्र बचपन से ही एक अद्भुत 'बाल कौतुक' थे। उनके बचपन की एक बहुत ही प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना है, जब वे मात्र 5 से 7 वर्ष के थे, तब वे मिथिला के राजा के दरबार में गए। राजा उस छोटे बालक को देखकर मुस्कुराए, तब उस छोटे से बालक शंकर मिश्र ने संस्कृत में वह ऐतिहासिक श्लोक पढ़ा <strong>(जो इस पृष्ठ के सबसे ऊपर दिया गया है)</strong> जिसने पूरे राजदरबार को स्तब्ध कर दिया।
प्रमुख रचनाएँ और दार्शनिक योगदान
शंकर मिश्र मुख्य रूप से न्याय-वैशेषिक दर्शन के प्रकांड विद्वान थे। महर्षि कणाद (जिन्होंने परमाणुवाद या Atomic theory दी थी) के 'वैशेषिक दर्शन' को पुनर्जीवित करने का पूरा श्रेय शंकर मिश्र को जाता है।
उपस्कार (Upaskara): यह उनकी सबसे महान और प्रसिद्ध रचना है। यह महर्षि कणाद के 'वैशेषिक सूत्र' पर लिखी गई सबसे प्रामाणिक और विस्तृत टीका है। आज दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में वैशेषिक दर्शन को समझने के लिए इसी ग्रंथ को मूल आधार माना जाता है।
अन्य महान रचनाएँ: खण्डनखण्डखाद्य टीका (महान अद्वैत वेदांती श्रीहर्ष के अत्यंत कठिन ग्रंथ पर शानदार टीका), न्याय लीलावती कण्ठाभरण, भेद रत्न प्रकाश और वादि विनोद।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
शंकर मिश्र केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि वे उस युग के प्रतीक हैं जब मिथिला का 'नव्य-न्याय' पूरे भारत में ज्ञान का सर्वोच्च मानक बन रहा था। सरिसब गाँव के जिस 'मूल' का आपने जिक्र किया था, उसकी महानता केवल एक वंशावली होने में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि उस मिट्टी ने अयाची मिश्र और म० म० शंकर मिश्र जैसे पिता-पुत्र को जन्म दिया, जिनकी बौद्धिक विरासत पर आज भी भारतीय दर्शन गर्व करता है।